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rajendrarathore


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माता दंतेश्वरी की महिमा अपार

Posted On: 28 Sep, 2011  
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35 फीसदी भारतीय निरक्षर

Posted On: 8 Sep, 2011  
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यूपीए सरकार में 7 बरस बाद छत्तीसगढ़

Posted On: 13 Jul, 2011  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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आजादी के बाद तिगुनी बढ़ी आबादी

Posted On: 11 Jul, 2011  
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सांसद निधि में आखिर वृद्धि क्यों?

Posted On: 8 Jul, 2011  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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अब डाक्टर नहीं रहे भगवान !

Posted On: 30 Jun, 2011  
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मध्यमवर्ग की कमर तोड़ रही महंगाई

Posted On: 26 Jun, 2011  
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Posted On: 26 Jun, 2011  
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भारत में हर दूसरा व्यक्ति देता है रिश्वत

Posted On: 23 Jun, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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मेहन्गाईदेवी को खूश करने हमारे यहा एक स्पेसियल आयोग का गठन किया हुआ है जो हर बार पगारा बढाने की शीफारिश करता रेहता है । पगार बढता है तब आप खुश हो जाते हो, मेहन्गाईदेवी और फुदकने लगती है उस की परवाह नही करते । अब जब मेहन्गाईदेवी अपनी जवानी की चरम पर है तो हमारी सांसद निधि भी बढे ईसमे नया क्या है । माना के आप लोक-शाही के नशेमे चूर हो । लेकिन हम आप जैसे मुर्ख नही है । हम जनते है हम हमारे आलाकमान के गुलाम है । उन मेहरबानी पाने के लिये हम उन के चरनो की धुल भी खा लेते है , उनके हर नखरे हमे उठाना पडता है । आप सोचते है की गेन्गलीडर (आलाकमान) से हमे प्यार है । बिलकुल जुठ, मौका मिले तो सबसे पेहले हम ही उसे गोलीसे उडा दे । लेकिन आपकी लोक–शाही ने उसे हमारे मथ्थे पर दे मारा है । जैसे हमे आपके मथ्थे पर मारा है । हमारी सांसद निधि की ईर्शा करने से पेहले जाओ अपनी लोक-शाही सुधारो । लोक-शाही के कौन से नियम से हमारे गेन्गलीडर आपके सामने आ जाते है ? अपनी गेन्ग को रजिस्टर करा दिया और बन बैठे गेन्गलिडर । कितनी गेन्ग की जरूरत है वो कौन देखे कर दो रजिस्टर । गेन्गवोर होती है तो होती रहे । क्या आपने उन को चुना है ? आपका अधिकार है भी ? क्या आप की लोक-शाही रेल है जो किसी को चुनाव मे खडा रहने के लिए टिकिट खरीदना पडता है ? लोक-शाही के कौन से नियम से गेन्गलीडरो को टिकिटबारी पर बैठने का अधिकार है ? जाहीर है महाचापलूस, महाभ्रष्टाचारी और धनवान ही टिकिट खरीद सकता है । है कोइ चोईस ? चुनाव के दौरान आप खूद चक्कर खा जाते हो, ये तो सब चोर के भाई चोर है जाव किसी को वोट नही देना है । आप वोट नही करते । लेकिन कुछ लोग वोट दे आते है , जिनमे सोचने की क्षमता नही होती । आपने भी कभी नही सोचा की टिकिटबारी को उखाड फैन्कना है या उस पर आपका अधिकार होना चाहिये, आसमान से टपके हुये गेन्गलिडर का नही । ये जरूरी नही की हर गेन्ग मे गुन्डे ही भरे पडे हो । अच्छे लोग भी होते है जीन्हे आप ही टिकिट दिलवा सकते हो या टिकिटबारी को उखाड कर सब को खडा रेहने का अधिकार दिलवा सकते हो । उन मे से आप हिरा ढुन्ढ सकते हो ( हिरा नही तो कुछ अच्छा आदमी ) । सांसद निधि को हडपना हमे भी अच्छा नही लगता लेकिन हम मजबुर है । हमारा अधिकार भी है । ईसे पाने के लिये अपने आत्मसमान की बलि दी है । आत्मसमान की किमत वसुलना क्या गुनाह है । भ्रष्टाचार है ? आज की तारिख मे आपका कोइ हक नही बनता जो आप हमको सिखाये सांसद निधि का क्या करना है । हम आपके गुलाम नही अपने गेन्गलिडर के गुलाम है, उसका फैन्का हम उठाते है । किस आधार पर मानते हो हम आपके चुने हुए प्रतिनीधि है । हम अपने मालिक के प्रतिनीधि है । अपने मालिक ने हमे चुना है टिकिट दे कर । आपको उल्लु बनाया है । भाई मै तो आप को ही भ्रष्टाचारी मानता हु । खोखली लोक-शाही को लोक-शाही समज कर एतराना, अपनी नासमजी को नही समज पाना, अपने को पन्डित मानकर भ्रष्टाचार की सर्चा करना और मौका मिले तो खूद भ्रष्टाचारी बन जाना । ये सब भ्रष्टाचार नही तो क्या है । http://bharodiya.jagranjunction.com/2011/06/26/%E0%A4%9A%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B5-%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%96%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%80-%E0%A4%86%E0%A4%AE/

के द्वारा: bharodiya bharodiya

भाई राजेंद्र राठौर जी आपने लेख तो बहुत ही रोचक बना दिया है उसके लिए बधाई स्वीकार करें. मुहावरे में भरष्टाचार को परिलक्षित करने के लिए यह कहना "भारत में हर दूसरा व्यक्ति देता है रिश्वत" बहुत अच्छा लगता है लेकिन देश की भयावह तस्वीर प्रस्तुत करना कुछ अच्छा नहीं लगा ? आपने लिखा है "अंर्तराष्ट्रीय भ्रष्टाचार दिवस के मौके पर जारी रिपोर्ट की बात करें तो पिछले साल भारत में काम करवाने के लिए 54 फीसदी लोगों ने रिश्वत दी," राठौर जी इसके साथ अगर आप आंकड़ो पर ही विशवास करे तो पहले तो आपको यह देखना होगा की यह ५४ प्रतिशत किस संख्या का प्रतिशत है आपकी हिसाब से तो लगभग भारत में ६५ करोड़ लोगो ने रिश्वत दी जो किसी भी प्रकार से सही नहीं है हाँ मैं यह मान सकता हूँ की बिना रिश्वत की कोई काम नहीं होता लेकिन उसके लिए तो हम ही जिम्मेदार है क्योंकि अपना समय और खर्च बचाने के लिए हम अपने लिए जो सुविधा खरीदते है उसे रिश्वत देना कहते है - जैसे मैं अपना बिजली का बिल जमा कराने के लिए बिजलीघर के पास पनवाड़ी को बिल और पैसे दे आता हूँ और वह १० रूपये अधिक लेकर मेरा बिल जमा करा देता है - इसी प्रकार से अगर मुझे इलाहबाद जाना है तो मैं दिल्ली से चलने वाली ट्रेन में जनरल बोगी के स्थान पर स्लीपर ,प्रथम ए.सी, द्वितीय ए.सी, या तृतीय ए.सी में यात्रा करना अधिक सुविधाजनक समझता हु और उसके लिए एक्स्ट्रा पैसे देने के लिए भी तैयार रहता हूँ - तो यह तो सुविधा खरीदने की बात हुई यह रिश्वत किस प्रकार से कहेंगे जो पाप हम स्वयं करते है उसे दूसरों के सर मढ़ने में कुछ अधिक ही मजा आता है - भाई राठौर जी एक बार फिर सोंचो भारत में केवल १० करोड़ लोग ही इस गंदगी को करते है जिसका पूरी आबादी का प्रतिशत केवल 0 .0824 % ही बैठता है - साथ ही आपसे अनुरोध है की मेरी बैटन का बुरा न माने अगर फिर भी आपको मेरी बातों पर शंका है तो मुझे मेरे इमेल पर संपर्क करे sohan.p.singh@gmail.com आपका धन्यवाद/

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राजेन्द्र राठोर जी -सार्थक लेख -हमारे उच्चतम न्यायालय ने जो कहा बहुत सही कहा कितने लोग रिश्वत देते हैं आंकड़े भले कुछ कहें लेकिन देते हैं लोग मरते क्या न करते दौड़ दौड़ हार जाते है जब पैसा भी अधिक फूंकते हैं तो समझौता कर खुद को भी नियम नीति से गिरा लेते हैं दोषी सब है पर इनकी मज़बूरी को न्यायालय और सरकार को देखना चाहिए निम्न सटीक है सुप्रीम कोर्ट ने देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार पर चिंता जाहिर करते हुए बीते अक्टूबर माह में एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा है कि सरकारी विभागों, खासतौर पर आयकर, पुलिस, राजस्व, बिक्रीकर और आबकारी विभागों में कोई भी काम बिना पैसा दिए नहीं होता। शुक्ल भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5




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