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भारत में हर दूसरा व्यक्ति देता है रिश्वत

Posted On: 23 Jun, 2011 में

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देश के विभिन्न राज्यों में जिस तरह से घूसखोर अधिकारी-कर्मचारी व नेता एंटी करप्शन ब्यूरो के शिकंजे में फंसते जा रहे है, उससे ऐसा लगता है कि यहां भ्रष्टाचार चरम पर है। हर जगह रिश्वत का बोलबाला है और रिश्वत के बिना कुछ भी काम होना संभव नहीं है। एक तरह से रिश्वतखोरी देश का सर्वमान्य धर्म बन गया है, जिसका पालन देश के अधिकांश लोग पूरी निष्ठा व ईमानदारी से कर रहे हैं। यही वजह है कि रिश्वतखोरी के आधार पर बनाए गए भ्रष्ट देशों की सूची में भारत सबसे ऊपर है, जहां हर दूसरे व्यक्ति ने रिश्वत देने की बात मानी है।
देश के एक छोटे कर्मचारी से लेकर नेता, मंत्री सब रिश्वतखोर हो गए हैं। इस वजह से यह समझ में नहीं आता कि कौन सच्चा है। आज किसी कमजोर या गरीब तबके के व्यक्ति का छोटा-मोटा काम भी रिश्वत के बगैर नहीं हो पाता, जो सर्वाधिक दुख की बात है। हमारे देश में विशेषकर राजनैतिक व प्रशासनिक हल्कों में रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार हरामखोरी तथा अपराधीकरण जैसी विसंगतियां नई बात नहीं हैं। 6 दशक पीछे की बात करें, तो देश की स्वतंत्रता के बाद प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय से ही सरकारी खरीद में घोटालों की खबरें आनी शुरु हो गई थी। पुरातन काल से चली आ रही रिश्वतखोरी आज एक ऐसा भयानक रूप धारण कर चुकी हैं, जिसने पूरे देश के विकास के अलावा यहां की अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया है। भारत देश आज कहने को स्वतंत्र है, लेकिन सही मायने में यह कैसी आजादी है, जहां टैक्स चोरी, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी तथा अन्य तमाम गलत तरींकों से कमाई गई नेताओं, अधिकारियों, भ्रष्टाचारियों तथा निजी कंपनियों के मालिकों की पूंजी अब इतनी बढ़ गई है कि वाशिंगटन के एक संस्था ग्लोबल फाईनेंशियल इंटिग्रिटी को इस विषय पर आंकड़े जारी करने पड़े हैं। जिसमें बताया गया है कि भारत में आजादी से लेकर अब तक कम से कम 450 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है। अंर्तराष्ट्रीय भ्रष्टाचार दिवस के मौके पर जारी रिपोर्ट की बात करें तो पिछले साल भारत में काम करवाने के लिए 54 फीसदी लोगों ने रिश्वत दी, जबकि पूरी दुनिया की चौथाई आबादी घूस देने को मजबूर है। यह बात ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में सामने आई है। जर्मनी के बर्लिन स्थित एनजीओ ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के सर्वे में दुनिया भर में घूसखोरी को लेकर आंकड़ें इकट्ठे किए गए। इसके लिए 86 देशों में 91,000 लोगों से बात की गई है। भारत में 74 फीसदी का कहना है कि पिछले 3 सालों में रिश्वतखोरी बढ़ी है, जबकि दुनिया में यह बात स्वीकार करने वालों की संख्या 60 प्रतिशत है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे ज्यादा भ्रष्ट पुलिस विभाग है। पुलिस विभाग से सरोकार रखने वाले 29 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्होंने रिश्वत दी है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल 2003 से भ्रष्टाचार पर रिपोर्ट जारी करती रही है। यह उसकी 7 वीं रिपोर्ट है, जिसमें पहली बार चीन, बांग्लादेश और फलीस्तीनी को शामिल किया गया है। 2010 के ग्लोबल करप्शन बैरोमीटर के मुताबिक, पिछले 12 महीनों में हर चौथे आदमी ने 9 संस्थानों में से एक में काम करवाने के लिए घूस दी, इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य और टैक्स अधिकारी शामिल हैं। सर्वे में भारत को इराक और अफगानिस्तान सहित सबसे भ्रष्ट देशों में गिना गया है। रिश्वतखोरी के आधार पर बनाए गए भ्रष्ट देशों की सूची में भारत, अफगानिस्तान, कंबोडिया, कैमरून, इराक, नाइजीरिया और सेनेगल जैसे देशों के साथ सबसे ऊपर है, जहां हर दूसरे व्यक्ति ने रिश्वत देने की बात मानी है।
यदि रिश्वतखोरी व भ्रष्टाचार का दीमक हमारे देश के नेताओं व अधिकारियों के रूप में देश को न चट करता तो कोई संदेह नहीं है कि भारत अब तक विकास के मामले में चीन को भी पीछे छोड़ चुका होता। एक तरह से देश की राजनीति का अधिकांश भाग इस समय भ्रष्टाचार के दलदल में सिर से पांव तक डूबे हुए हैं। मगर वे खुद को भोलीभाली जनता के सामने पाक साफ जरूर बताते हैं। यदि वे सच में रिश्वतखोर नहीं हैं और अपने मेहनत की कमाई खाते हैं, तो यह भी स्पष्ट करें कि उनके पास करोणों और अरबों रूपए आखिर कहां से आते हैं। फैक्ट्री, आलीशान बंगला, कीमती वाहन और विदेशी सामान वे कैसे खरीद पाते हैं। एक कर्मचारी से लेकर विधायक व सांसद को सरकार जो वेतन देती है, मेरे हिसाब से उससे महज परिवार ही चल सकता है। एक अहम बात यह है कि वर्तमान दौर में रिश्वखोरी हमारे देश का सर्वमान्य धर्म है। यही एक मात्र ऐसा धर्म है जिसका पालन देशवासी बड़ी निष्ठा से करते हैं। एक भृत्य से लेकर कलेक्टर, कमिश्नर, सांसद, विधायक और मंत्री तक इस धर्म के पालन पर एकमत हैं। वे अपने धर्मों को लेकर आपस में चाहे जितना सिर फुटौवल करें, लेकिन रिश्वत धर्म निभाने में सभी एकमत हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी और असम से गुजरात तक हमें रिश्वतखोरी के मजबूत धागे ने ही एकमत होने पर विवश किया है। हमारे देश की एकता और अखण्डता का सबसे बड़ा सबूत रिश्वतखोरी को ही माना जा सकता है। सोचने वाली बात यह है कि टाटा समूह का प्रमुख रतन टाटा 12 वर्ष बीत जाने के बाद कहता सुनाई दे कि उससे एक केन्द्रीय मंत्री ने टाटा समूह सिंगापुर एयरलाईंस के साथ मिलकर देश में एक निजी विमानन कंपनी स्थापित करने के लिए लाइसेंस स्वीकृत कराने 15 करोड़ रुपए की रिश्वत मांगी थी। इससे साफ हो गया कि उद्योगपति भी अपना काम चलाने के लिए रिश्वत देते हैं। आश्चर्य तो तब ज्यादा लगता है जब एक विभाग में कार्यरत कर्मचारी ही अपने स्टाफ के किसी व्यक्ति से काम करने के एवज में रिश्वत की मांग करता है और बिना लेनदेन के कलम भी नहीं चलाता। एक ऐसा ही मामला छत्तीसगढ़ के जांजगीर जिले में कुछ दिन पहले ही सामने आया। सहकारिता विभाग के हेड क्लर्क ने अपने रिटायर्ड अधिकारी से ही पेंशन प्रकरण स्वीकृत कराने के एवज में 2000 रूपए रिश्वत मांगे थे, लेकिन उसे रिटायर्ड अधिकारी ने अपनी चतुराई से एंटी करप्शन ब्यूरों के जाल में फंसा दिया। ऐसे मामले आए दिन सामने आ रहे हैं। यह बात इसलिए कहनी पड़ रही है कि ऐसा एक भी दिन नहीं बच रहा, जब देश में रिश्वतखोरी का कोई मामला सामने न आया हो।
सुप्रीम कोर्ट ने देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार पर चिंता जाहिर करते हुए बीते अक्टूबर माह में एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा है कि सरकारी विभागों, खासतौर पर आयकर, पुलिस, राजस्व, बिक्रीकर और आबकारी विभागों में कोई भी काम बिना पैसा दिए नहीं होता। न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर की पीठ ने कहा कि भारत के लिए सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि अब भ्रष्टाचार पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है. भ्रष्टाचार को रोकने के लिए बनाई गई इकाईयां ही भ्रष्टाचार में लिप्त पाई जाती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने खासतौर पर शासकीय विभागों में व्याप्त रिश्वतखोरी पर चिंता जाहिर की। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने व्यंग्य करते हुए कहा कि बेहतर है राज्य सरकारें रिश्वतखोरी को वैध कर दे, ताकि लोग एक निश्चित राशि देकर सरकारी विभागों में अपना काम करा ले। रिश्वतखोरी की दर तय होने से लोगों को भी रिश्वत देने में आसानी होगी तथा इससे हर आदमी को पता लग जाएगा कि अमुक काम के लिए उसे कितनी रिश्वत देनी है!
दूसरी तरफ सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने सरकार के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी है, वे देश में लोकपाल विधेयक लागू कराना चाहते है। वहीं रिश्वतखोरी व कालेधन के खिलाफ योगगुरू बाबा रामदेव छह माह पहले से ही लड़ाई लड़ रहे हैं। वे बड़े नोंटो को बंद कराने के पक्षधर है। साथ ही विदेशों में जमा कालेधन को वापस भारत लाने की जिद पर अड़े हैं। सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे व योगगुरू को आखिर ऐसे आंदोलन की जरूरत ही क्यांे पड़ रही है। क्या सचमुच आज देश के शीर्षस्थ नेता बिक चुके हैं? वे सबकुछ जान समझकर भी रिश्वतखोरी पर शिकंजा कसने कोई कदम नहीं उठना चाहते या फिर उन्हें खुद के अवैध कमाई बंद होने की चिंता है। इस तरह के सवाल अकेले मेरे मन में ही नहीं बल्कि, देश के हजारों-लाखों लोगों के मन में कौंध रहे हैं। इसका जवाब सरकार से भारत के हर नागरिक को मिलने ही चाहिए।

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4 प्रतिक्रिया

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J L SINGH के द्वारा
July 11, 2011

श्री राजेंद्र जी, समसामयिक और सार्थक लेख के लिए बधाई! हमसबको जागरूक होना पड़ेगा तभी समस्या का समाधान होगा, बाबा रामदेव या अन्ना हजारे अकेले कुछ नहीं कर सकते जब तक कि हम सब उनका साथ न दें. लिखना लोगों को जगाने के समान है. ऐसे लेखों से जन जागरण तो होगा ही. परिणाम अच्छा होगा ऐसी उम्मीद करता हूँ. जमशेदपुर के लोकसभा के उपचुनाव में एक इमानदार छवि का पूर्व पुलिस कप्तान सभी राजनीतिक दलों को धुल चटा सकता है. एक टी. एन. शेषण चुनाव तंत्र को सुधार सकता है. अत: हमें निराश होने की जरूरत नहीं. हम अपने कर्तव्य-पथ पर जमे रहें. एक बार पुन: धन्यवाद!

singh s.p. के द्वारा
June 25, 2011

भाई राजेंद्र राठौर जी आपने लेख तो बहुत ही रोचक बना दिया है उसके लिए बधाई स्वीकार करें. मुहावरे में भरष्टाचार को परिलक्षित करने के लिए यह कहना “भारत में हर दूसरा व्यक्ति देता है रिश्वत” बहुत अच्छा लगता है लेकिन देश की भयावह तस्वीर प्रस्तुत करना कुछ अच्छा नहीं लगा ? आपने लिखा है “अंर्तराष्ट्रीय भ्रष्टाचार दिवस के मौके पर जारी रिपोर्ट की बात करें तो पिछले साल भारत में काम करवाने के लिए 54 फीसदी लोगों ने रिश्वत दी,” राठौर जी इसके साथ अगर आप आंकड़ो पर ही विशवास करे तो पहले तो आपको यह देखना होगा की यह ५४ प्रतिशत किस संख्या का प्रतिशत है आपकी हिसाब से तो लगभग भारत में ६५ करोड़ लोगो ने रिश्वत दी जो किसी भी प्रकार से सही नहीं है हाँ मैं यह मान सकता हूँ की बिना रिश्वत की कोई काम नहीं होता लेकिन उसके लिए तो हम ही जिम्मेदार है क्योंकि अपना समय और खर्च बचाने के लिए हम अपने लिए जो सुविधा खरीदते है उसे रिश्वत देना कहते है – जैसे मैं अपना बिजली का बिल जमा कराने के लिए बिजलीघर के पास पनवाड़ी को बिल और पैसे दे आता हूँ और वह १० रूपये अधिक लेकर मेरा बिल जमा करा देता है – इसी प्रकार से अगर मुझे इलाहबाद जाना है तो मैं दिल्ली से चलने वाली ट्रेन में जनरल बोगी के स्थान पर स्लीपर ,प्रथम ए.सी, द्वितीय ए.सी, या तृतीय ए.सी में यात्रा करना अधिक सुविधाजनक समझता हु और उसके लिए एक्स्ट्रा पैसे देने के लिए भी तैयार रहता हूँ – तो यह तो सुविधा खरीदने की बात हुई यह रिश्वत किस प्रकार से कहेंगे जो पाप हम स्वयं करते है उसे दूसरों के सर मढ़ने में कुछ अधिक ही मजा आता है – भाई राठौर जी एक बार फिर सोंचो भारत में केवल १० करोड़ लोग ही इस गंदगी को करते है जिसका पूरी आबादी का प्रतिशत केवल 0 .0824 % ही बैठता है – साथ ही आपसे अनुरोध है की मेरी बैटन का बुरा न माने अगर फिर भी आपको मेरी बातों पर शंका है तो मुझे मेरे इमेल पर संपर्क करे sohan.p.singh@gmail.com आपका धन्यवाद/

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
June 24, 2011

राजेन्द्र राठोर जी -सार्थक लेख -हमारे उच्चतम न्यायालय ने जो कहा बहुत सही कहा कितने लोग रिश्वत देते हैं आंकड़े भले कुछ कहें लेकिन देते हैं लोग मरते क्या न करते दौड़ दौड़ हार जाते है जब पैसा भी अधिक फूंकते हैं तो समझौता कर खुद को भी नियम नीति से गिरा लेते हैं दोषी सब है पर इनकी मज़बूरी को न्यायालय और सरकार को देखना चाहिए निम्न सटीक है सुप्रीम कोर्ट ने देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार पर चिंता जाहिर करते हुए बीते अक्टूबर माह में एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा है कि सरकारी विभागों, खासतौर पर आयकर, पुलिस, राजस्व, बिक्रीकर और आबकारी विभागों में कोई भी काम बिना पैसा दिए नहीं होता। शुक्ल भ्रमर ५

    Rajendra Rathore के द्वारा
    June 25, 2011

    श्री सुरेन्द्र शुक्ला जी, आपने मेरा आलेख पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया दी, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। आशा करता हूं कि आप सभी के मार्गदर्शन व स्नेह से मैं हमेशा देश व समाज से जुड़े विषयों पर लिखता रहूं।


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